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সংস্কৃত ভাগৱত (শ্ৰীধৰ স্বামীৰ টীকা থকা) শ্ৰীশ্ৰীবালি সত্ৰৰ আদ্যদশম-স্কন্ধ ভাগৱত আৰু শ্ৰদ্ধেয় ডাঃ সূৰ্য্যকুমাৰ ভূঞা ডাঙৰীয়াই সংগ্ৰহ কৰা “ধৰ্ম্মপুৰাণ” প্ৰধান। এই সকলোবোৰ পুথিৰ ভিতৰত শ্ৰীশ্ৰীবালি সত্ৰৰ শ্ৰীযুক্ত শিৱেন্দ্ৰনাৰায়ণ দেৱাধিকাৰৰ ঘৰত পোৱা আদ্য-দশমখন বেছি পুৰণি বুলি বোধহোৱাত আমি সংগ্ৰহ কৰোঁ।[১] আৰু বাওনাই চন্দ্ৰ ধৰিবলৈ হাত মেলাৰ দৰে ইয়াৰ প্ৰকাশ-কাৰ্য্য হাতত লওঁ। |
सूतों पर उपत्यका के लोग जंगली पेड़ों के छिलकों और पत्तों का रंग देकर विभिन्न रंगोंके सूत तैयार करते हैं और उनसे विभिन्न रंग-विरंगा कपड़ा बुनकर काम में लाते हैं। खासी, नंगा आदि पहाड़ों पर बसनेवाले लोग बहुत दिनों पहले से ही कपास के सूत पर अनेक प्रकारके रंग लगाने का कार्य करते आये हैं। इन कपड़ों पर नाना प्रकार के फूल-पत्ते निकालने की प्रणाली भी बहुत समय से चलती आई है। बौंद्ध भिक्षुओंने सोनेके पन्नों पर अनेक चित्र अंकित कर पुस्तक लिखी थी। हमारे समीपवर्ती पहाड़ के किनारे पर अवस्थित बापु चांग के भिक्षुओं के पास ऐसी दुष्प्राप्य पुस्तक अब भी विद्यमान है।[২]
हमारे देखने में अनेक प्राचीन सचित्र पुस्तकों आयी हैं— जिनमें, जोरहाट के श्रीश्रीफूलबाड़ी सत्रका “कीर्तन-घोषा”, श्रीश्रीआउनिआटी सत्र का “हस्तिविद्यामहार्णव”, नौगांव के श्रीश्रीकर्चुंग सत्र का “सस्कृत-भागवत” (श्रीधर स्वामी की टीका सहित), श्रीश्रीबालि सत्र का “आद्य दशस स्कन्ध भागवत” और श्रडेय डा० सर्यकुमार भूइयाँ द्वारा संग्टहीत “धर्मपुराण" प्रधान हैं। इन सभी पुस्तकों के देखने पर हमें श्रीश्रीबालि सत्र के श्रीशिवेन्द्रनारायण देवाधिकार के घरमें जो आद्य दशम स्कन्ध मिला सबसे प्राचीन प्रतीत होने पर उसका हमने संग्रह किया[৩] और वामनके चांद पकड़ने के समान ही उसके प्रकाशन का कार्य हमने अपने हाथमें लिया। |
- ↑ ১৮১ পৃষ্ঠাৰ চিত্ৰৰ ওপৰত "চতুৰ্দ্দসি তিথিত পাতিয়ো ধনুৰ্ষাগ। কৰা সিৱপূজা কাটী অসংখ্যাত চাগ॥" যি শাৰী পদ আছে তাতেই সেই সময়ৰ লিপি আৰু বানানৰ নিদৰ্শন দেখা পাব।—সম্পাদক।
- ↑ शिवसागर में ऐसी पुस्तक जो पाली भाषामें थी, अपनी आँखोंसे देखी हैं
- ↑ १८१ पृष्ठ के चित्र के उपर चतुदर्श तिथि में धनुर्वाम मानायो, शिवकी पूजा करो, अनगिनत वकरे काटी वाली पंक्तिमें उस समय की लिपि और वर्णनका निदर्शन मिलेगा।—सम्पादक।